प्रारब्ध दर्शनPRARABDH DARSHANऑकल्ट और एल्केमी · अध्ययन
गुरजीफ़ के
तीन भोजन
शरीर, साँस और छाप
अन्न, हवा और छाप के रूपांतरण से
स्वयं के स्मरण तक।

हम दिन में तीन बार खाना खाते हैं और मान लेते हैं कि शरीर इसी से चलता है। गुरजीफ़ इस धारणा को बहुत छोटा मानते थे। उनके अनुसार इंसान को एक नहीं, तीन तरह का भोजन मिलता है, और इनमें से जिस भोजन पर हम सबसे कम ध्यान देते हैं, वही हमारे भीतर सबसे गहरा असर छोड़ता है।
पहला भोजन वह है जो हम मुँह से खाते और पीते हैं। दूसरा भोजन हवा है, जो हर पल साँस के रास्ते भीतर जाती है। तीसरा भोजन है छाप (impressions), यानी वह सब जो आँख, कान, त्वचा और मन के रास्ते हम तक पहुँचता है: एक चेहरा, एक आवाज़, एक खबर, एक रंग, किसी का अपमान भरा वाक्य, सुबह की धूप।
यह बात सुनने में साधारण लगती है, पर गुरजीफ़ ने इसे एक पूरे ब्रह्मांडीय विज्ञान से जोड़ा था। पी. डी. उस्पेंस्की की किताब "इन सर्च ऑफ़ द मिरैकुलस" में यह शिक्षा विस्तार से दर्ज है।
इंसान एक तीन मंज़िला कारखाना
गुरजीफ़ इंसानी शरीर को एक तीन मंज़िला कारखाने की तरह देखते थे। नीचे की मंज़िल पेट है, जहाँ भोजन पहुँचता है। बीच की मंज़िल छाती है, जहाँ फेफड़ों में हवा आती है। सबसे ऊपर की मंज़िल सिर है, जहाँ छाप पहुँचती है।
इस कारखाने का काम है कच्चे माल को बारीक पदार्थों में बदलना। मोटा अनाज धीरे धीरे खून बनता है, खून से और सूक्ष्म ऊर्जाएँ बनती हैं, और अंत में वह पदार्थ बनता है जिसे गुरजीफ़ सबसे ऊँचा उत्पादन मानते थे। यह पूरी प्रक्रिया उनके "सप्तक का नियम" (Law of Octaves) पर चलती है, यानी वही नियम जो संगीत के सात सुरों में दिखता है: सा, रे, ग, म, प, ध, नि। गुरजीफ़ इन्हें पश्चिमी नाम देते थे: डो, रे, मी, फ़ा, सोल, ला, सी।
इस नियम की सबसे ज़रूरी बात यह है कि कोई भी प्रक्रिया सीधी रेखा में नहीं चलती। सप्तक में दो जगह ऐसे "अंतराल" (intervals) आते हैं जहाँ गति अपने आप रुक जाती है या मुड़ जाती है। मी और फ़ा के बीच, और सी और अगले डो के बीच। इन जगहों पर बाहर से एक धक्का, एक "शॉक" चाहिए, वरना प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती।
तीन भोजनों की पूरी शिक्षा इसी अंतराल को समझने की कुंजी है।

पहला भोजन: जो हम खाते हैं
भोजन पेट में पहुँचकर अपना सप्तक शुरू करता है। गुरजीफ़ की भाषा में यह सबसे स्थूल पदार्थ है, जिसे वे "हाइड्रोजन 768" कहते थे। यहाँ हाइड्रोजन रसायन वाला तत्व नहीं है, बल्कि पदार्थ के घनत्व का एक पैमाना है। संख्या जितनी बड़ी, पदार्थ उतना स्थूल।
पाचन के साथ यह भोजन डो से रे में जाता है, फिर मी तक पहुँचता है। और यहीं पहला अंतराल आता है। अगर इस बिंदु पर कुछ न मिले, तो भोजन की यात्रा यहीं ठहर जाएगी।
प्रकृति ने इस अंतराल को भरने का इंतज़ाम पहले से कर रखा है। यहीं दूसरा भोजन प्रवेश करता है।
दूसरा भोजन: हवा
साँस भीतर जाती है और फेफड़ों में अपना अलग सप्तक शुरू करती है। हवा भोजन से कहीं सूक्ष्म है, इसलिए वह भोजन वाले सप्तक के मी बिंदु पर ठीक उसी घनत्व में मिलती है। यही मिलन भोजन के सप्तक को वह धक्का देता है जिससे वह फ़ा, सोल, ला होते हुए सी तक पहुँच जाता है।
सी पर जो पदार्थ बनता है, गुरजीफ़ उसे शरीर का सबसे परिष्कृत उत्पादन मानते थे। यह यौन ऊर्जा (sex energy) का पदार्थ है। तंत्र से परिचित पाठक को यहाँ ओज और बिंदु की याद आएगी। यह वही कच्ची, शक्तिशाली ऊर्जा है जो या तो नई देह रचती है, या अगर सही दिशा मिले तो चेतना की नई देह बनाने का ईंधन बनती है।
हवा का अपना सप्तक भी चलता है। डो से रे, रे से मी। और फिर वही बात: मी पर रुकावट। हवा का सप्तक भी अधूरा रह जाता है।
यहाँ तक का सारा काम अपने आप होता है। आप सोते रहें, बेहोश रहें, फिर भी पेट पचाता रहेगा और फेफड़े साँस लेते रहेंगे। प्रकृति ने इतना इंतज़ाम कर दिया है कि शरीर जीवित रहे और प्रजाति चलती रहे।

तीसरा भोजन: छाप
अब आता है वह भोजन जिसकी बात शायद ही कोई करता है। गुरजीफ़ के अनुसार इंसान बिना भोजन के हफ़्तों जी सकता है, बिना हवा के कुछ मिनट, पर बिना छाप के एक पल भी नहीं। अगर किसी इंसान तक बाहर से कोई भी छाप पहुँचना बंद हो जाए, तो जीवन का आधार ही टूट जाएगा।
छाप सबसे सूक्ष्म भोजन है और यह सबसे ऊपर की मंज़िल, यानी सिर में प्रवेश करती है। यह ठीक उस घनत्व पर आती है जहाँ हवा का सप्तक मी पर अटका था। तो स्वाभाविक रूप से लगेगा कि छाप हवा को धक्का देगी और काम आगे बढ़ेगा।
पर ऐसा होता नहीं।
साधारण इंसान में छाप डो के रूप में आती है और वहीं ठहर जाती है। वह रे तक जाती ही नहीं। उसका कोई सप्तक शुरू नहीं होता। छाप आती है, एक हल्की सी लहर उठती है, और फिर वह बेहोशी में बिखर जाती है। हम देखते हैं पर देखा हुआ भीतर पचता नहीं। हम सुनते हैं पर सुना हुआ हमें बदलता नहीं।
इसका कारण प्रकृति की कोई कमी नहीं है। प्रकृति ने यहाँ जानबूझकर काम अधूरा छोड़ा है। आगे का रास्ता इंसान को खुद तय करना है।
पहला सचेत शॉक: स्वयं का स्मरण
गुरजीफ़ के पूरे काम का केंद्र यही बिंदु है। छाप के सप्तक को आगे बढ़ाने के लिए जो धक्का चाहिए, वह बाहर से नहीं आता। वह एक सचेत प्रयास से आता है, जिसे गुरजीफ़ "स्वयं का स्मरण" (self-remembering) बोलते थे।
स्वयं का स्मरण यह है कि जिस क्षण कोई छाप भीतर आ रही है, उसी क्षण आप यह भी जानें कि "मैं हूँ, और यह मुझ तक आ रहा है।" ध्यान दो दिशाओं में एक साथ जाता है: बाहर उस चीज़ की ओर जो दिख रही है, और भीतर उस पर जो देख रहा है।
एक उदाहरण लीजिए। आप चाय का कप उठाते हैं। साधारण अवस्था में हाथ उठता है, चाय होंठों तक पहुँचती है, और मन किसी ईमेल या किसी पुरानी बात में उलझा रहता है। चाय का स्वाद, कप की गर्मी, उस क्षण की रोशनी, सब आया और चला गया। अब वही पल दूसरी तरह से जिएँ। कप की गर्मी हथेली में महसूस हो, और साथ में यह अहसास भी कि यह गर्मी "मुझे" महसूस हो रही है। उस क्षण छाप पचती है।

गुरजीफ़ के अनुसार इस पहले सचेत शॉक से छाप का सप्तक रे और मी तक पहुँचता है, और साथ में हवा का अटका हुआ सप्तक भी फ़ा और सोल तक बढ़ जाता है। यानी कारखाने में ऐसे सूक्ष्म पदार्थ बनने लगते हैं जो साधारण जीवन में कभी नहीं बनते। यही वह कच्चा माल है जिससे भीतर एक अलग "देह" का निर्माण संभव होता है, जिसे गुरजीफ़ सूक्ष्म शरीर (astral body) बोलते थे।
दूसरा सचेत शॉक: भावनाओं का रूपांतरण
पहला शॉक काम को आगे बढ़ाता है, पर छाप का सप्तक फिर एक जगह अटकता है, अपने मी बिंदु पर। यहाँ दूसरा सचेत शॉक चाहिए, और यह पहले से कहीं कठिन है।
गुरजीफ़ इसे नकारात्मक भावनाओं के रूपांतरण (transformation of negative emotions) से जोड़ते थे। किसी का कड़वा वाक्य, कोई अन्याय, कोई ईर्ष्या, यह सब भी छाप है, और सबसे भारी छाप है। साधारण इंसान ऐसी छाप को या तो दबा देता है या उसमें बह जाता है। दोनों हालत में ऊर्जा नष्ट होती है।
रूपांतरण का अर्थ भावना को नकारना नहीं है। इसका अर्थ है उसी क्षण उसके साथ पहचान (identification) न करना। क्रोध उठे, पर आप क्रोध न बन जाएँ। जो ऊर्जा आमतौर पर झगड़े, शिकायत या भीतर की घुटन में जल जाती, वही ऊर्जा ऊपर की ओर बहने लगती है।
यहाँ तंत्र और गुरजीफ़ एक जगह मिलते दिखते हैं। तंत्र भी विष को अमृत बनाने की बात करता है। जो ऊर्जा बंधन बनाती है, वही ऊर्जा सही होश में मुक्ति का साधन बनती है।
आप क्या खा रहे हैं?
इस शिक्षा का सबसे व्यावहारिक हिस्सा यही सवाल है। हम खाने की थाली पर बहुत ध्यान देते हैं: कितनी कैलोरी, कितना प्रोटीन, क्या शुद्ध है, क्या नहीं। हवा के प्रदूषण पर भी अब बात होती है। पर छाप के आहार पर लगभग कोई नहीं सोचता।
रात के ग्यारह बजे एक के बाद एक रील्स, बिना रुके खबरों का शोर, ऐसी बातचीत जिसमें सिर्फ़ शिकायत हो, ऐसा संगीत जो सिर्फ़ उत्तेजना पैदा करे। यह सब भोजन है, और यह सिर की मंज़िल में जाकर वहीं जमा होता है। बेहोशी में ली गई छाप भीतर पचती नहीं, सड़ती है। फिर हम हैरान होते हैं कि बिना कुछ किए इतनी थकान क्यों है।
गुरजीफ़ की दृष्टि से इसका उपाय दुनिया से भागना नहीं है। उपाय दो हैं। पहला, छाप का चुनाव: जितना संभव हो, ऐसी छाप लें जो जीवित हो, जैसे प्रकृति, सच्ची कला, गहरी बातचीत, मौन। दूसरा, और ज़्यादा ज़रूरी, छाप को होश में लेना। एक साधारण दृश्य भी, अगर स्वयं के स्मरण के साथ लिया जाए, तो पोषण बन जाता है। और सबसे सुंदर दृश्य भी, अगर बेहोशी में देखा जाए, तो बस गुज़र जाता है।
कुछ प्रयोग
पहला प्रयोग: दिन में तीन बार, भोजन से ठीक पहले, कुछ साँसों के लिए रुकें। थाली को देखें, उसकी गंध लें, और महसूस करें कि यह आप तक आ रहा है। यह तीनों भोजनों को एक साथ होश में लाने का सबसे आसान तरीका है।
दूसरा प्रयोग: जब भी कोई नकारात्मक भावना उठे, उसे नाम दें और देखें कि शरीर में वह कहाँ है। छाती में, पेट में, जबड़े में। बस देखें। उसे सही ठहराने की कहानी शुरू न करें।
तीसरा प्रयोग: सोने से पहले के आधे घंटे को "छाप का उपवास" बना लें। कोई स्क्रीन नहीं, कोई नई जानकारी नहीं। दिन भर की छाप को पचने का समय दें।

समापन
गुरजीफ़ की यह शिक्षा एक सीधी सी बात पर टिकी है। प्रकृति ने इंसान को जीवित रखने का पूरा इंतज़ाम कर दिया है, पर जागने का इंतज़ाम नहीं किया। पहले दो भोजन अपने आप पचते हैं। तीसरा भोजन तभी पचता है जब कोई भीतर मौजूद हो।
इसीलिए असली सवाल यह नहीं है कि आज आपने क्या खाया। असली सवाल यह है कि आज जो कुछ आपकी आँखों, कानों और मन तक पहुँचा, उसे लेते समय आप वहाँ थे या नहीं।
